ईसीसी सोसायटी चुनाव:ट्रैक मेनों के मैदान में आने से दोनों मान्यता प्राप्त यूनियनों में मची खलबली

चुनाव अभी दूर,लेकिन अभी से भरी धूप में खाक छानते घूम रहे नेता,सबकी निगाह लगी ट्रैक मेनों पर

झांसी।ईसीसी सोसायटी के चुनावों में ट्रैक मेनों के चुनाव लड़ने से दोनों यूनियनों के माथे पर बल पड़ने लगे हैं।हालांकि एनसीआरएस के पास खोने को कुछ नहीं है,लेकिन मेंस यूनियन का ताज इस बार बड़े संकट में पड़ गया है। जहां तक ट्रैकमेनों के संयुक्त मोर्चा का सवाल है,इस बार वह किसी का भी खेल बिगाड़ने का माद्दा रख रहा है।इसी वजह से अभी से दोनों यूनियन के नेताओं को कर्मचारियों की जबरदस्त तरीके से याद आने लगी है।
ईसीसी सोसायटी के चुनावों में एनसीआरईएस कभी भी उल्लेखनीय दावेदारी पेश नहीं कर पाई।इसी कारण मेंस यूनियन को अपना पैनल जिताने में कभी कोई दिक्कत नही हुई। लेकिन सोसायटी के इकतरफा राजपाट पर इस बार सबसे कड़ी चुनौती उसे मिलने जा रही है।दरअसल वर्षों से उपेक्षित ट्रैक मेनों ने इस बार संयुक्त मोर्चा के बैनर तले उन्हें सीधी चुनौती दे दी है।अपनी एशोसिएशन आरकेटीए के तहत पहले से ही दोनों मान्यता प्राप्त यूनियनों को खुली चुनौती दे रहे यह लोग अब चुनावी मैदान में डटे हुए हैं।स्थिति यह हो गई है कि अभी केवल नामंकन ही हुआ है लेकिन दोनों यूनियन के नेता अपने समर्थकों के साथ कर्मचारियों के पास पहुंचने लगे हैं।
सोसायटी के चुनावों में अभी तक ट्रैक मेन मजबूती से मेंस यूनियन के साथ खड़े रहे।इसी वजह से इसे कभी भी पैनल जिताने में कोई दिक्कत नहीं आई।जहां तक एनसीआरईएस का सवाल है,उसे इनका समर्थन बहुत ही सीमित मात्रा में मिला है।शायद यही कारण रहा कि यह संगठन बड़ी दावेदारी कभी पेश नहीं कर पाया।इस बार भी वह ऐसा कर पायेगा,इसमें भी शक है।
सूत्रों का रेलवार्ता से दावा है कि संग़ठन ने इस बार भी कई ऐसे चेहरों पर दांव लगाया है,जो कर्मचारियों के बीच अपनी पहचान तक नहीं बना पाएं हैं।अपने को बड़ा दिखाने के चक्कर में इसके नेेताओं ने चहेतों को उम्मीदवार बनाते समय संग़ठन को एकतरफ रख दिया है। हालांकि इसके पास खोने को कुछ नहीं है लेकिन शायद अनजान चेहरों पर दांव लगाकर उसने लड़ाई से पहले ही अपने को कमजोर कर लिया है।
दूसरी ओर मेंस यूनियन की साख इस बार दांव पर लग गई है।हालत यह हैं कि 26 जून को वोटिंग होना है,लेकिन अभी से इसके मण्डलमंत्री सेक्शन की खाक छानते घूम रहे हैं।दरअसल मेंस यूनियन को लग रहा है की यदि ट्रैक मेन संघटित हो गए तो इस बार लेने के देने पड़ सकते है।
मेंस यूनियन के नेताओं में हार का इतना ख़ौफ़ बैठा हुआ है कि पिछली बार चोर दरवाजे से डेलीगेट बने इसके बड़े नेता इस बार चुनाव मैदान में ही नहीं उतरे हैं।
वहीं दूसरी ओर ट्रैक मेनों ने इस बार संयुक्त मोर्चा बनाकर अपना पैनल उतार दिया है।हालांकि यह भी 100 प्रतिशत सच है कि इस मोर्चे में शामिल अधिकांश यूनियनों/एसोसिएशनों का कोई जनाधार नहीं है।लेकिन यदि ट्रैक मेन एकजुट हो गए,जिसकी संभावना अभी कम ही दिख रही,तब फिर किसी भी यूनियन का यह खेल बिगाड़ देंगे।फिलहाल ट्रैक मेन अपने आपको एकजुट करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं,लेकिन दोनों यूनियनों में शामिल ट्रैक मेन इनकी राह में रोड़ा बने हुए हैं।फिलहाल यह कोशिश की जा रही है कि यूनियनों में शामिल ट्रैक मेन का एक वोट आरकेटीए को कैसे भी दिलाया जाए।यदि यह कोशिश सफल हो गई तो चुनाव फिर पैनल वोट की जगह एक एक प्रत्याशी पर आकर टिक जाएगा,और ऐसे में फिर कोई भी चुनाव जीत सकता है।

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One comment

  1. रंजन कुमार

    अबकी बार ट्रैकमैन की सरकार

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