लोकसभा चुनाव,कर्मचारियों के मुद्दे प्रचार से गायब,किसी भी दल के लिए आखिर क्यों महत्वपूर्ण नहीं हैं कर्मचारी!

नईदिल्ली।पहले चरण के मतदान के लिए अब कुछ ही समय बचा है लेकिन किसी भी दल के लिए कर्मचारी कोई मुद्दा नहीं हैं। कहीं पर भी नई पेंशन योजना को रद्द करने या फिर कर्मचारियों के जीवन स्तर में सुधार के लिए कहीं किसी और से आवाज़ नहीं आ रही है।
लोकसभा चुनाव में कर्मचारियों की चिंता किसी भी दल को नहीं है।किसी के पास भी इनके लिए दो शब्द नही है।ऐसे में यह तबका पूरी तरह से उपेक्षित है। ऐसे में यह किस ओर मतदान करेंगे,कुछ नही कहा जा सकता।
वैसे कर्मचारियों को उस वक़्त सबसे ज्यादा निराशा हुई,जब कांग्रेस ने अपना घोषणा पत्र जारी किया।दरअसल एनपीएस को लेकर आन्दोलित कुछ नेताओं ने दावा किया था कि प्रियंका गांधी ने उनसे वायदा किया था कि इसे खत्म करने के लिए पार्टी के घोषणा पत्र में इसको शामिल किया जाएगा।इसके बाद सोशल मीडिया में उनकी यह घोषणा जमकर छाई रही। लेकिन यह दावा उस वक़्त धरा का धरा रह गया,जब पार्टी के घोषणा पत्र में इस बारे में कुछ नहीं कहा गया।
देश की दो प्रमुख पार्टियों का कम से कम एनपीएस पर एक ही स्टैंड शुरू से रहा है।बीजेपी जहां इसे लेकर आई तो कांग्रेस इसे कानूनी जामा पहना गई।ऐसे में अब बीजेपी के घोषणा पत्र से कोई उम्मीद करना ही बेमानी है।
आखिर क्यों कर्मचारी किसी भी दल के लिए महत्वपूर्ण स्थान नहीं रखते हैं,कभी आपने यह सोचा है।दरअसल कर्मचारी संगठनों की राजनीतिक दलों के साथ मिलीभगत से कर्मचारियों को घाटा उठाना पड़ रहा है।लगभग सभी राजनीतिक दलों ने अपने कर्मचारी संगठन बना रखे हुए हैं।यह लोग उसी राजनीतिक दल की पैरवी करते हैं।ऐसे में जब सरकार दूसरे दल की होती है तो इन्हें कर्मचारियों की तमाम दिक्कतें याद आ जाती है लेकिन जैसे ही सरकार बदलती है वैसे ही यह चुप हो जाते हैं और सरकार के साथ मिलकर मलाई खाते हैं।सबसे बड़ी बिडम्बना तो यह है कि कर्मचारी भी इनके आगे पीछे भागते है,ऐसे में राजनीतिक दल भी जानते हैं कि टुकड़ों में बंटा कर्मचारी कभी ताकतवर नहीं हो सकता।ऐसे में यदि चुनावों में इनको कोई महत्व नहीं दे रहा है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं हैं।

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