रेलवे बोर्ड अध्यक्ष अश्विनी लोहानी

सांपनाथ-नागनाथ के बीच पूरे वर्ष पिसते रहे कर्मचारी, लोहानी से बरकरार हैं उम्मीदें

नईदिल्ली।एक वर्ष और बीत गया लेकिन रेल कर्मचारियों को उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आई।जहां से पिछले वर्ष शुरुआत की थी,इस वर्ष उससे आगे जाने के बजाए और पीछे की और चले गए।अंधकार बुरी तरह से फैलता जा रहा है लेकिन किसी ओर से उजाले के कोई संकेत नहीं हैं।नेता मस्त हैं क्योंकि उनके रुतबे में भले गिरावट आई लेकिन कमाई कहीं से कम नहीं हुई।रेलवे बोर्ड के नए मुखिया अश्विनी लोहानी के आने से जो उम्मीद की किरण जागी थी,अब वह भी मन्दिम हो चली।फिर भी उम्मीदें पूरी तरह से टूटीं नहीं हैं।
रेलकर्मचारियों में उत्साह की जो उमंग लोहानी की रेलवे बोर्ड अध्यक्ष बनने से जागी थी,वह भले मन्दिम होती जा रही है,लेकिन आज भी सबसे ज्यादा उम्मीदें कर्मचारियों को उन्ही से हैं।नेताओं के आश्वासनों से ऊब चुके कर्मचारी अब उनकी बातों पर विश्वास करने को तैयार नहीं हैं।
उम्मीदें भले टूटीं न हों लेकिन आशा की किरण अब भी कर्मचारियों के दिल मे जगह बनाये हुए हैं।नई पेंशन योजना को रद्द कराने के लिए कमर कसे युवा कर्मचारियों को भले सरकार के रवैये से निराशा हाथ लगी हो,लेकिन अभी भी उम्मीदें उनके दिल में जिंदा हैं।उनको लगता है कि एक न एक दिन सरकार के बन्द पड़े कानों में उनकी गूंज पहुंच ही जाएगी।इसी उम्मीदों से वह अपने संघर्ष को और तेज करने जा रहे हैं।उनको लगता है कि चुनावी वर्ष में सरकार को अपने बन्द पड़े कान खोलना ही पड़ेंगे।
सातवें वेतन आयोग से निराश कर्मचारियों को अब इसमें सुधार की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है।उन्हें लग रहा है कि उनके हितों के साथ बड़ा समझौता नेताओं ने सरकार के साथ कर लिया है।ड्राइवरों के माइलेज पर कोई खुलकर कुछ बोलने को तैयार नहीं है तो ट्रैक मेनों के भविष्य पर किसी से आसरा नहीं है।एलडीसी उनके लिए सपना बनी हुई है।इसके लिए वह जी तोड़ संघर्ष तो कर रहे हैं लेकिन हाथ फिर भी खाली हैं।कोई भी फेडरेशन उनके साथ इस मुद्दे पर नहीं है।नेताओं को डर लग रहा है कि यदि उन्होंने इनके लिए एलडीसी के दरवाजे खुलवाए तो अन्य विभाग के कर्मचारियों में नाराजगी फैल जाएगी।वैसे भी उनको लगता है कि वर्षों से यूनियनों के कार्यक्रमों में दरी बिछाने वाले यह कर्मचारी प्रमोशन के लायक नही हैं। हालत बदल गए हैं यूनियनों को भी इसका अहसास हो रहा है लेकिन विकल्प नहीं होने के कारण वह निश्चित हैं कि यह कैडर कहीं नहीं जा सकता।सच भी यही है।ट्रैक मेनों के नाम से बने ढेर सारे एशोसिएशन चुनाव लड़ नहीं सकते।ऐसे में यह जायँगे कहां?इनके पास घर बैठने की मजबूरी है या फिर दोनों में से ही किसी को वोट देने की मजबूरी। शायद इसीलिए यह कैडर नेताओं की नजरों में किसी सुविधा का पात्र नहीं है।
वेतन आयोग द्वारा लूटा गया हो या सरकार ने आंखे दिखाईं हों,पूरी साल कर्मचारी बेसहारा नजर आए।नए साल में स्थितियां बदलेंगी,इसकी भी उम्मीद नहीं है।आगामी माह में होने जा रहे मान्यता के चुनावों में फिर यही दोनों संघटन जीत कर आएंगे। ऐसे में सांपनाथ-नागनाथ के बीच मे कर्मचारियों को फिर अगले 6 वर्ष पिसना है,यही एकमात्र सच्चाई भी है।चाहे कोई संघटन कितने बड़े भी दावे करे लेकिन हकीकत यही है कि राष्ट्रीय स्तर पर अभी इन दोनों फेडरेशनों को टक्कर देने वाला कोई नहीं है।
फिर भी उम्मीदों पर दुनिया टिकी है,रेलवार्ता की हमेशा से कोशिश रही है कि सच्चाई को बिना किसी लाग लपेट के सामने लाया जाए,इस कोशिश में किसी के दिल को ठेस लगी हो तो सच को स्वीकार करते हुए आपसे क्षमा प्रार्थी हैं। नए वर्ष की आप सभी को सपरिवार बहुत बहुत बधाई।यह वर्ष आप सभी की मनोकामनाएं को पूर्ण करे,यही ईश्वर से कामना है।

 

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2 comments

  1. Ldce open to all ke bare me bolo

  2. Sir ji
    Happy New Year 2019
    GM/TM AIRF/NFIR ke alawa Kisi bhi sangthan ko vote karega
    Uske pass Ab rista vikalp h
    Isliye ab LDC open ke liye hm hmare bhaiyo ko jagrook karenge

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