तो क्या अधिकारियों के संरक्षण में हुआ वर्कशॉप में नमकीन घोटाला!

झांसी। रेलवे वर्कशॉप में फैले भ्रष्टाचार पर रोक लगाने वाला कोई नहीं है ऐसा लग रहा है कि सब बड़े मिलजुल कर आपस में खा रहे हैं। रेलवार्ता द्वारा 8000 किलो नमकीन का घोटाला उजागर करने के बाद आज तक दोषियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की कोई जांच नहीं की गई। इससे ऐसा लगता है कि यह सब कारनामा बड़े अधिकारियों की मिलीभगत से हुआ है। दूसरी तरफ सूत्रों का दावा है कि मेंस यूनियन अपने पदाधिकारियों के फंसने के डर से वर्कशॉप प्रशासन पर इस मामले की जांच नहीं करने का दबाव बनाया हुआ है।
गौरतलब है कि बीते दिनों रेलवार्ता ने मेंस यूनियन के चुने हुए पदाधिकारियों और कैंटीन मैनेजर की आपसी मिलीभगत के चलते होली के अवसर पर 8000 किलो नमकीन ठेकेदार से वर्कशॉप में ही बनवाया। सूत्रों का कहना है कि 90 रूपये प्रति किलो के हिसाब से बनवाए गए इस नमकीन को लेकर किसी भी प्रकार की कोई भी निविदा या टेंडर आदि किसी भी समाचार पत्र में नहीं निकल वाया गया। सबसे बड़ी बात तो यह है कि जिस ठेकेदार से यह नमकीन बनवाया गया वह खाद्य सुरक्षा के मानकों को भी पूरा नहीं करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि गुपचुप तरीके से कैंटीन प्रशासन ने ठेकेदार से इतनी भारी मात्रा में नमकीन बनवाया?
दूसरी ओर सूत्रों का कहना है कि ठेकेदार ने भले 90 रूपये प्रति किलो के हिसाब से नमकीन सप्लाई किया हो लेकिन इस नमकीन को बनाने के लिए उसने कैंटीन में कार्यरत कर्मचारियों और कैंटीन में उपलब्ध संसाधनों का भरपूर प्रयोग किया। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब कैंटीन में कार्य कर्मचारियों और यहां उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग ही करना था तब फिर बाहर के ठेकेदार को ठेका क्यों दिया गया? इससे साफ जाहिर होता है कि नमकीन बनवाने में मेंस यूनियन के चुने हुए पदाधिकारी और कैंटीन मैनेजर ने जमकर भ्रष्टाचार किया है।
सूत्रों का कहना है कि यह कैंटीन के इतिहास में पहली बार हुआ है जब होली या दीपावली के अवसर पर बनने वाला नमकीन बाहर के ठेकेदार से बनवाया गया हो। इससे पहले यह नमकीन कैंटीन में कार्यरत कर्मचारियों से ही बनवाया जाता रहा है। वहीं दूसरी तरफ वर्कशॉप के कई कर्मचारियों ने रेलवार्ता प्रतिनिधि को बताया की वर्तमान संचालक गण के चलते खाने की क्वालिटी एकदम निम्नस्तरीय हो गई है। क्वालिटी को सुधारने की बजाये मेंस यूनियन के चुने हुए प्रतिनिधि वर्कशॉप प्रशासन से मिलकर इस कैंटीन को भविष्य में निजी हाथों में देने की कोशिश में लगे हुए हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो यूनियन रेलवे में निजीकरण का विरोध करती हो वह यहां पर इसे ही बढ़ावा दे रही है। अपने निजी स्वार्थ की खातिर अभी होली के अवसर पर 8000 किलो नमकीन बनवाना निजीकरण को बढ़ावा देना नहीं तो और क्या है।
इससे पहले कैंटीन के चुनाव के अवसर पर इसी मेंस यूनियन ने इसकी दशा और दिशा सुधारने का वादा कर जबरदस्त तरीके से कर्मचारियों का समर्थन हासिल किया था लेकिन वर्तमान हालत को देखकर कई कर्मचारी इस यूनियन को वोट दे कर पछता रहे हैं। इन लोगों का साफ कहना है कि यह कैंटीन जब एनसीआरईएस के समय में फायदे में थी और इसकी लगभग 72000 रूपये की एफडी भी थी फिर ऐसा क्या हुआ कि आज यह कैंटीन संसाधन विहीन होती जा रही है। वर्तमान कैंटीन मैनेजर इस दुर्दशा के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार हैं। वहीं सूत्रों का दावा है कि 8000 किलो नमकीन का घोटाला उजागर होने के बाद जिस प्रकार से अभी तक सीडब्ल्यूएम और डिप्टी सीपीओ ने किसी भी प्रकार की जांच के आदेश नहीं दिए हैं उससे ऐसा लगता है कि यह घोटाला उनके संरक्षण में हुआ है और कहीं ना कहीं इससे मिलने वाले लाभ में वह भी भागीदार हैं।

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