मेंस यूनियन के यूथ सम्मेलन से गायब रहे यूथ,वेणु नायर भी आकर्षित नहीं कर पाए युवाओं को

दरअसल कुछ निर्णायक करने के बजाये आये दिन केवल भाषणों का डोज पिला रहे इन नेताओं में अब कम से कम आम रेलकर्मचारियों में कोई रुचि नहीं है। इनके भाषण अब न तो किसी को उद्देलित करते हैं और न ही उनमें जोश भरते हैं। केवल खानापूर्ति करने के लिए यह लोग उपस्थित इसलिए हो जाते हैं कि उनके सुपरवाइजरों ने उनको वहां जाने के लिए मजबूर किया था।

झांसी।वही घिसे पिटे डायलॉग,हमने यह किया,यह दिलाया,यह करेंगे वो करेंगे जैसे नारों से ऊब चुके युवा अब इनके खोखले दावों में और दिलचस्पी लेने के मूड में नहीं हैं। यह नजारा मेंस यूनियन के यूथ सम्मेलन में भाग लेने आये एआईआरएफ के नेता और सेंट्रल रेलवे के महामंत्री वेणु नायर,एनसीआर के महामंत्री आर डी यादव के भाषणों के दौरान देखने को मिला।अधिकांश युवा या तो इस दौरान सोते रहे या फिर गपशप में मस्त रहे। या फिर सेल्फी लेते रहे। सम्मेलन में उंगली पर गिनने लायक युवा रहे बाकी की कुर्सियां पदाधिकारियों से भरीं गई ताकि लोगों को भीड़ दिखे।
मेंस यूनियन का यूथ सम्मेलन बुरी तरह से फ्लॉप रहा। युवाओं के नाम पर उंगली पर गिनने लायक युवा उपस्थित हुए।वह भी जब एआईआरएफ के नेता और सेंट्रल रेलवे मुंबई के महामंत्री वेणु नायर जैसा वक़्ता इस कार्यक्रम में शामिल हुआ। अपनी भाषण देने की कला में सबसे आगे खड़े इस नेता के भाषणों में भी अब यहां के युवाओं में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
दरअसल कुछ निर्णायक करने के बजाये आये दिन केवल भाषणों का डोज पिला रहे इन नेताओं में अब कम से कम आम रेलकर्मचारियों में कोई रुचि नहीं है। इनके भाषण अब न तो किसी को उद्देलित करते हैं और न ही उनमें जोश भरते हैं। केवल खानापूर्ति करने के लिए यह लोग उपस्थित इसलिए हो जाते हैं कि उनके सुपरवाइजरों ने उनको वहां जाने के लिए मजबूर किया था।
दरअसल भीड़ नहीं जुटने का अंदेशा इसके आयजकों को पहले से ही था। इसी वजह से सभी ब्रांचों की फ़र्ज़ी बैठक दिखाकर स्पेशल सीएल निकलवाई गई।सदस्य के तौर पर ऐसे कर्मचारियों को भी छुट्टी दिलवाई गई जो यूनियन के शुभचिंतक तो थे लेकिन सामने आने से हिचकते रहे हैं। इसके बावजूद भी उंगली पर गिनने लायक कर्मचारी आये। आम कर्मचारियों ने तो काफी पहले से ही ऐसे कार्यक्रमों से अपनी दूरी बना ली है।ऐसे में पदाधिकारियों की दम पर चल रहे इन आंदोलनों/कार्यक्रमों से अब इन लोगों ने भी दूरी बनाना शुरू कर दी है।
दरअसल सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों पर सरकार के साथ नेताओं ने जो नूराकुश्ती खेली है उसका खामियाजा अब इनको भुगतना पड़ रहा है।कर्मचारियों की साथ कि गई धोखाधड़ी से आम कर्मचारियों के मन मे इनके प्रति जमकर नफरत भरी पड़ी है।विकल्प नहीं होने के अभाव में यह लोग मजबूरीवश इनके साथ दिखने को मजबूर हैं ताकि नेताओं के कहर से बचा जा सके। कई कर्मचारियों का रेलवार्ता से कहना था कि यदि वह लोग इनकी मीटिंग में न जाएं तो उनके सुपरवाइजर उन्हें मजबूर कर देते हैं।मजबूरीवश उनको न चाहते हुए भी ऐसे सम्मेलनों में जाना पड़ता है।

 

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